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पहचान पत्र

पहचान बना ले तू अपनी – जीवन को तू बरबाद न कर; यौवन तो है बस सौ दिन का – इसको तू बेकार न कर ... अब अगली पीढ़ी देख रही – उसको तू बेजार न कर; निकल तू पूरा सज-धज कर – दुनिया को तू निराश न कर; कृष्णीष्ट बनाया है तुझको – गुरु दरबार लगा समय बेकार न कर. आज का दिन सर्वोत्तम है – निष्छल दुनिया का बिगुल बजा; अगली पीढ़ी को निष्छल राह दिखे – ज्ञानवाच का निष्छल सूर्य दिखा; निष्छलकर्ण बना है पृथ्वी पालक – सूचना का प्रचार प्रसार तू कर.. तरस गई बेचारी दुनिया – उसका कुछ अब उद्धार तो कर ... कृष्णांश बना है कृष्णीष्ट फिर – कृष्ण बना कृष्णेंद्र तभी; निष्छल टेम्पल लगा हरिद्वार – दिल्ली में लगा कृष्णीष्ट गुरुदरबार; पहले था भारत विश्वगुरु – अब दिल्ली दरबार विश्वगुरु बन गया; दुनिया को बता आओ निष्छल हो जाओ इसी जन्म में कर लो पुनर्जन्म पुनर्जन्म पायेगा निष्छल दुनिया में भ्रममुक्त बुद्धि निष्छल मन निरोगी तन, मानव जीवन होगा सबका सफल निष्छल कुटुम्ब को मिलेगा जब बल कुच्छानाकर ...

तेल अभिषेक निष्ठा इप देवी

निष्ठा योग विधि से – इप देवी की करलो सेवा; विधि पूर्वक करोगे सेवा – मिलता रहेगा मेवा .. शुक-ज्ञानिता गा लो पहले – माता से शक्ति ले लो; इश्तहा इप देवी का होता है तेल अभिषेक; सरसों तेल की बोतल लेलो तुम एक मिट्टी के वह दीपक लगे अनेक  कौनसा खाली तुम लो देख... डाल दो बोतल का इसमें तेल – मुनिव्रता मन्त्र का करते रहो उच्चारण जब तक उसमे ख़त्म न हो जाए तेल मन्त्र अधूरा न रह जाए – बिगड़ जाएगा खेल.. निष्ठा योग विधि से – इप देवी की करलो सेवा; निष्छल-माता आरती गाओ – सारे कष्ट भूलते जाओ; दस मिनट की श्वास-पैथी करलो – प्रणाम कर शेस्श नवालो; निष्ठा योग विधि से – इप देवी की करलो सेवा;

जल अभिषेक श्री शिव

निष्ठा योग विधि से सीखो पूजा भगवान् की; विधि पूर्वक पूजा फिर तुम कर लो  कृष्षांश की ... गौमुखी में जल तुम भर लो – मुख को अंगुली से बन्द कर लो; मुनिव्रता मन्त्र के 5 जाप तुम कर लो – श्री शिव पर फिर छोड़ो – गौमुखी जल की धारा; अहम् शिवम् अहम् शवम् का लगते रहो नारा ....  जल ख़त्म होने पर – आरती कर लो  कृष्षांश की; निष्ठा योग विधि से सीखो पूजा भगवान् की ...

शून्य

मैं शून्य हूँ  - मैं शून्य हूँ - मैं शून्य हूँ - मैं शून्य हूँ    शून्य की एक ही है पहचान – बनाता सबको वह अपना गुलाम; निर्दयता ही है उसकी जान – पिलाता प्यार का है वो जाम शून्य की यही है इक पहचान  मैं शून्य हूँ 

निश्छालिज्म

निश्छालिज्म (न्युमोकैल रूहानी योग) श्री बनता है पांच तत्व से – रूह बंटी है पांच सत्व से; रूह चलती है मन की राह – शरीर करता है बुद्धि की चाह | .. बुद्धि जड़ है सब रोगों की – मन को कर रखा बदनाम; मन तो है गट्ठर कर्मफलों का – नहीं कर सकता ख़ुद कोइ काम | दिशा का करती है बुद्धि चुनाव – इन्द्रियों को फिर करती इस्तेमाल; उलटे-सीधे काम कराती तन से – रख देती करके उसका बुरा हाल

श्री शिव आराधना

1       श्री शिव को मेरा प्रणाम - श्री शिव को ही मेरा सलाम; श्री शिव को मेरा प्रणाम - श्री शिव को ही मेरा सलाम .... 2       श्री शिव का करती मैं अभिषेक – बनी रही मेरी नियत नेक; आये चाहे कष्ट अनेक – परिवार सदा बना रहे एक ... श्री शिव को मेरा प्रणाम ......... 3       श्री शिव को मेरा प्रणाम - श्री शिव को ही मेरा सलाम; श्री शिव को मेरा प्रणाम - श्री शिव को ही मेरा सलाम ....

जीवन पुकार

कबीर ज्ञान द्वारा तू स्वास्थ्य लाभ कर ले; गुरु ग्रन्थ जी के द्वारा तू योनी मुक्ति कर ले .. अपने विवाह को तू बन्धन-मुक्त कर ले; योग से तू जीवन में आनन्द भर ले .... जीवन जो बिताया – उसमे बहुत कमाया; आया था खर्च करने – अब तो खर्च करले... गिनती के बचे हैं सांस – इन्वैस्ट इनको कर ले; रोग-मुक्त हो जो परिवार – स्वस्थ कर ले... मानव-योनी पाई – इसका अर्थ समझ ले; कृष्णांश है बैठा उसको – सुनले और समझले.. अपने 5 तत्वों को तू – संतुलन में ले आ; आगे के जीवन को तो – अब तू मस्त कर ले..